प्लास्टिक जिसे लोग कचरा समझते थे, उसी से सड़क बनाने वाले प्रोफेसर की कहानी
नई दिल्ली: प्लास्टिक कचरा आज भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती है। बोतल, पैकेजिंग और रोजमर्रा की दूसरी चीजों के इस्तेमाल के बाद बचने वाला प्लास्टिक लंबे समय तक खत्म नहीं होता। यही वजह है कि इसका निपटारा लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। लेकिन भारत के एक प्रोफेसर ने इसी समस्या को एक अलग नजरिए से देखा और बेकार प्लास्टिक को सड़क निर्माण से जोड़ने का तरीका विकसित किया।
इस कहानी के केंद्र में हैं प्रोफेसर राजगोपालन वासुदेवन, जिन्हें ‘प्लास्टिक मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने ऐसी तकनीक विकसित की, जिसमें बेकार प्लास्टिक को सड़क बनाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल किया जा सकता है। उनके काम को देश में पर्यावरण और कचरा प्रबंधन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पहल के तौर पर देखा गया।
कचरे से समस्या नहीं, समाधान तलाशने की कोशिश
प्लास्टिक का इस्तेमाल आज हमारी जिंदगी का सामान्य हिस्सा बन चुका है। पानी की बोतल से लेकर खाद्य पदार्थों की पैकिंग तक, कई जरूरी सामान प्लास्टिक में आते हैं। परेशानी तब बढ़ती है जब इस्तेमाल के बाद यही सामग्री इधर-उधर फेंक दी जाती है।
सड़कों के किनारे, नालियों और खाली जगहों पर पड़ा प्लास्टिक सिर्फ देखने में खराब नहीं लगता, बल्कि इसके लंबे समय तक बने रहने की वजह से पर्यावरण पर भी असर पड़ता है। ऐसे में सवाल यह है कि जिस सामग्री को इस्तेमाल के बाद बेकार समझ लिया जाता है, उसका दोबारा उपयोग कैसे हो?
राजगोपालन वासुदेवन ने इसी सवाल पर काम किया। उन्होंने प्लास्टिक कचरे को सड़क निर्माण की प्रक्रिया में इस्तेमाल करने की तकनीक विकसित की। इसका मूल विचार यही था कि बेकार प्लास्टिक को पूरी तरह फेंकने के बजाय उसे एक उपयोगी निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए।
सड़क निर्माण में प्लास्टिक का इस्तेमाल
इस तकनीक की खास बात यह है कि सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के साथ प्रोसेस किए गए प्लास्टिक कचरे को शामिल किया जा सकता है। इस तरह प्लास्टिक कचरे के निपटारे की समस्या को सड़क निर्माण के साथ जोड़ने का रास्ता सामने आया।
यह विचार इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि इसमें दो अलग-अलग चुनौतियों को एक साथ देखने की कोशिश की गई—एक तरफ बढ़ता प्लास्टिक कचरा और दूसरी तरफ सड़क निर्माण के लिए जरूरी सामग्री।
2018 में मिला पद्म श्री सम्मान
राजगोपालन वासुदेवन के काम को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। उन्हें 2018 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके योगदान की देश स्तर पर मिली मान्यता को दर्शाता है। BCC
उनकी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि उन्होंने कचरे को केवल परेशानी के रूप में नहीं देखा। उन्होंने उसमें संभावित उपयोग तलाशने की कोशिश की। यही सोच किसी समस्या को नए नजरिए से देखने का रास्ता खोलती है।
आज जब प्लास्टिक कचरा लगातार चर्चा में है, राजगोपालन वासुदेवन का काम यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि रोजमर्रा की जिंदगी में बेकार समझी जाने वाली चीजों का बेहतर इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।
BCC: राजगोपालन वासुदेवन की प्लास्टिक-आधारित सड़क निर्माण तकनीक और 2018 के पद्म श्री सम्मान से संबंधित तथ्य यूजर द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं।

