संजय मिश्रा के लिए ट्रॉफी से ज्यादा खास रही मां की एक बात, बोले- अब घर में थोड़ी इज्जत बढ़ जाएगी
मुंबई। 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड में जब संजय मिश्रा का नाम बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के लिए पुकारा गया, तो यह उनके लंबे फिल्मी सफर का एक खास पड़ाव बन गया। फिल्म ‘भक्षक’ में उनके अभिनय के लिए उन्हें पहली बार नेशनल अवॉर्ड मिला। लेकिन सम्मान मिलने के बाद संजय मिश्रा ने जिस बात का जिक्र किया, उसने इस उपलब्धि को एक अलग ही रंग दे दिया।
अवॉर्ड समारोह में पत्नी के साथ पहुंचे संजय मिश्रा से जब इस सम्मान को लेकर बात हुई, तो उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि अब घर में थोड़ी इज्जत बढ़ जाएगी। उनका यह जवाब सुनने में भले मजाकिया लगे, लेकिन इसके पीछे वर्षों के संघर्ष और परिवार के साथ जुड़े उस रिश्ते की झलक भी दिखाई देती है, जो बड़े से बड़े पुरस्कार के बाद भी नहीं बदलता।
अवॉर्ड पर पिता का नाम लिखवाया
संजय मिश्रा के लिए यह सम्मान सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं था। उन्होंने अवॉर्ड पर अपने पिता शंभूनाथ मिश्रा का नाम लिखवाया। उनका कहना था कि उनके पिता सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और पीआईबी से जुड़े रहे थे और उनकी तनख्वाह से ही परिवार चलता था।
BCC के मुताबिक, संजय ने इस मौके पर अपने पिता को याद करते हुए बताया कि उनसे पूछा गया था कि वह अवॉर्ड पर किसका नाम लिखवाना चाहते हैं। उन्होंने पिता का नाम चुना। यही वजह है कि पुरस्कार मिलने के साथ उनके पुराने पारिवारिक रिश्ते और यादें भी सामने आईं।
मां ने अवॉर्ड नहीं, खाने की चिंता की
बेटे को राष्ट्रीय सम्मान मिलने की खबर सुनकर मां का रिएक्शन भी संजय ने खुद साझा किया। उनके मुताबिक, मां ने सबसे पहले यही पूछा कि खाना खाया या नहीं।
इतने बड़े सम्मान के बीच मां की चिंता का केंद्र अवॉर्ड नहीं, बेटे का खाना था। संजय ने बताया कि मां को यह भी लगा कि समारोह देर तक चला होगा और वहां उन्हें खाना मिला या नहीं। उन्होंने पिता को याद करते हुए कहा कि अगर वह आज होते तो उन्हें बहुत खुशी होती।
यही छोटा-सा पारिवारिक संवाद इस उपलब्धि के सबसे भावुक हिस्सों में शामिल हो गया। एक तरफ देश का बड़ा फिल्म सम्मान था, दूसरी तरफ मां की वही रोजमर्रा वाली चिंता।
‘भक्षक’ ने दिलाया राष्ट्रीय सम्मान
संजय मिश्रा को यह पुरस्कार ‘भक्षक’ में उनके अभिनय के लिए मिला। फिल्म में भूमि पेडनेकर भी अहम भूमिका में थीं। संजय ने पुरस्कार के बाद फिल्म के निर्देशक और निर्माताओं का आभार जताया और कहा कि कलाकार को अपनी बात काम के जरिए रखनी चाहिए।
उनके फिल्मी सफर को देखें तो यह सम्मान अचानक मिली उपलब्धि नहीं है। वर्षों तक फिल्मों और टेलीविजन में अलग-अलग किरदार निभाने के बाद उन्हें ऐसा किरदार मिला, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर उनके अभिनय को पहचान दिलाई।
मनोज मुंतशिर भी पुरस्कार से हुए भावुक
इसी समारोह में ‘मैदान’ के गीत ‘जाने दो’ के लिए मनोज मुंतशिर को बेस्ट लिरिक्स का नेशनल अवॉर्ड मिला। उन्होंने गीत बनने के समय की एक पुरानी घटना याद की। BCC के अनुसार, मुंतशिर ने बताया कि ए.आर. रहमान ने गाना तैयार होने के दौरान ही इसे नेशनल अवॉर्ड मिलने की बात कही थी।
मुंतशिर के लिए वह बात उस समय महज एक तारीफ जैसी थी, लेकिन अब वही याद पुरस्कार मिलने के बाद फिर सामने आ गई।
72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड की चमक के बीच संजय मिश्रा की कहानी इसलिए अलग नजर आती है क्योंकि यहां ट्रॉफी से ज्यादा चर्चा उन रिश्तों की हुई, जिनके बीच से उनका सफर निकला—पिता की याद, मां की चिंता और घर में इज्जत बढ़ने वाला उनका अपना मजाकिया अंदाज।
Report Gaurav D Srivastava

